सोमवार, 11 मार्च 2013

सियासत की गली में मोड़ बहुत हैं !


सियासत की गली में मोड़ बहुत हैं !

इस गन्ने में रस कम,पोर बहुत हैं !!

ऐ जिंदगी तू मुझे बेरुखी से ना देख,

संघर्ष भरे रण में यहाँ रणछोड़ बहुत हैं !!

सियासत तो कभी साफ सुथरी ना रही,

पर आजकल करनेवाले गठजोड़ बहुत हैं !!

गिरे बहुत ऊंचाई से हम तो पता चला,

हमको हमीं से जोड़नेवाले जोड़ बहुत हैं !!

बात उठी तो आया नहीं सामने कोई

बटी खैरात तो मचानेवाले होड़ बहुत हैं  !!

जिंदगी तो खुद ही नाजुक है “पंकज”,

फिर क्यों होते यहाँ तोड़ फोड़ बहुत हैं??

......................................................